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इस प्रवचन से जानिए- १. योग में वैराग्य और अभ्यास की महत्ता। २. मन वश में आने का क्रम।

FAQs

महर्षि पतंजलि के अनुसार योग के कितने अंग है?
महर्षि पतंजलि के योग शास्त्र में आठ अंग हैं- १.यम २. नियम ३. आसन ४. प्राणायाम ५. प्रत्याहार ६. धारण ७. ध्यान ८. समाधि।

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क्या कुण्डलिनी योग अष्टांग योग के अन्तर्गत है?

अभ्यास ओर वैराग्य- इनके द्वारा ही योगावस्था की प्राप्ति और उसकी स्थिरता हो सकती है। इनमें से अभ्यास के बारे में हमने देखा। अब वैराग्य। क्या है वैराग्य? दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैरा....


अभ्यास ओर वैराग्य- इनके द्वारा ही योगावस्था की प्राप्ति और उसकी स्थिरता हो सकती है।

इनमें से अभ्यास के बारे में हमने देखा।

अब वैराग्य।

क्या है वैराग्य?

दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम्।

यहां भी दो प्रकार के वैराग्य हैं।

साधना के प्रारंभ से लेकर संप्रज्ञात समाधि तक जिस वैराग्य की आवश्यकता है वह है अपर-वैराग्य।

संप्रज्ञात समाधि सिद्ध होने के बाद असंप्रज्ञात समाधि को पाने के लिए जिस वैराग्य की जरूरत है वह है पर-वैराग्य।

पहले अपर-वैराग्य को देखते हैं।

विषयों में आसक्ति, दृष्ट विषयों में और आनुश्रविक विषयों में।

क्या हैं दृष्ट विषय?

लौकिक विषय- जैसे पुरुष के लिए स्त्री के शरीर में आसक्ति, स्त्री के लिए पुरुष के शरीर में आसक्ति, भोजन में आसक्ति, पान में आसक्ति, प्रतिष्ठा प्रभुत्व इनमें आसक्ति।

आनुश्रविक का अर्थ है परलोक से संबंधित।

कुछ लोग हैं जो परलोक में सुख भोग पाने के लिए प्रयास करते रहते हैं।

योग के अन्दर भी वैदेह्य और प्रकृतिलय-ये दो अनुभूतियां हैं।

मैं शरीर नही हूं- यह है वैदेह्य की अनुभूति।

शरीर से नाता तोडकर प्रकृति में लय हो जाना, यह है प्रकृतिलय।

इन सब के लिए, इनमें से किसी के लिए भी अभिलाषा नहीं रखनी चाहिए।

लौकिक और आध्यात्मिक, दोनों स्तरों में सारी अभिलाषाओं को त्याग देना है ।

यह न केवल राग है।

आसक्ति द्वेष भी हो सकती है।

किसी से द्वेष- उसके धुन में रहना, उसके बारे में ही सोचता रहना।

दोनों को, राग और द्वेष दोनों को ही त्यागना है।

लौकिक और पारलौकिक विषयों को दोनों को ही त्यागना है।

यहां तक कि योग साधना में सिद्धि के विषय को भी त्यागना है।

उसमें भी आसक्ति नहीं होनी चाहिए।

इन सबको मन के वश में रखना है।

मन को इनके वश में नही करना।

मैं जो चाहूंगा, मैं उसके बारे में ही सोचूंगा।

जो मन में आया , उसके पीछे नहीं जाऊंगा।

यह है मन को वश में रखना।

मन इन्द्रियों के द्वारा ही विचलित होता है।

मन को अगर वश में रख पाओगे तो इन्द्रिय भी वश में आ जाएंगी।

इन्द्रियों को वश में रखोगे तो वे मन की ओर कम जानकारी भेजेंगी।

मन को कम विचलित करेंगी।

यह वैराग्य निष्क्रिय उदासीनता नहीं है।

यह सक्रिय है।

क्यों कि विषयों में दोष क्या है इसे जानकर ही उनपर अनासक्ति आती है।

विषयों के प्रति अनासक्ति एक जड काष्ठ में भी है।

विषयों के प्रति राग या द्वेष अन्ततः आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक क्लेशों को ही उत्पन्न करेगी - इस विवेक बुद्धि के साथ अनासक्ति आ सकती है।

मन को वश में लाना एक दिन में नही हो पाएगा।

इस में भी चार कदम हैं।

पहले इसके लिए सचेतन बुद्धिपूर्वक प्रयास करना।

तब कुछ विषयों में से मन हट जाता है, और कुछ विषयों में लगा रहता है।

इसके बाद सारे विषयों में से मन हट जाता है।

पर मन में उनका चिन्तन होता रहता है।

इसके बाद अपने संकल्प के बल से मन पूर्ण रूप से वश में आ जाता है।

यह है मन वश में आने का क्रम।

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