द्वादश ज्योतिर्लिंग

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द्वादश ज्योतिर्लिंग माहात्म्य

१-सोमनाथ

दक्ष प्रजापति ने अपनी अश्विनी आदि सत्ताईस कन्याओं का विवाह चन्द्रदेव से कर दिया। चन्द्रमा के समान लोकविभूषण और लोकानन्दकारी पति को पाकर वे बहुत प्रसन्न हुई और इसी प्रकार उन सत्ताईस देवियों को पाकर चन्द्रदेव भी बहुत सन्तुष्ट हुए । पर उनका सबसे अधिक प्रेम रोहिणी पर था। इस कारण अन्य दवियों के हृदय में बहुत दुःख हुआ। यह भेददृष्टि सपत्नी होने के कारण उनके लिये असह्य थी। जब उनसे न रहा गया तब वे अपने पिता दक्ष की शरण गई और उनसे यथार्थ स्थिति का वर्णन किया। यह वृत्तान्त सुनकर दक्ष चन्द्रमा के समीप गये और कहने लगे कि सब पत्नियों पर बरावर प्रेम रखना यह सबका कर्तव्य है। जो व्यक्ति भेदभाव रखता है वह मूर्ख समझा जाता है। इस लिये आपका-यह धर्म है कि मेरी सब पुत्रियों पर समान प्रेम रखें और किसी पक पर अधिक आसक्ति न रखें। अब जो हुआ सो हुआ,पर भविष्य में ऐसी वात नहीं होना चाहिए । 

ऐसा कहकर दक्ष तो अपने धाम को चले गये; पर चन्द्रमा ने यह भेद भाव नहीं छोड़ा। अब रोहिणी पर उनका और भी अधिक अनुराग हो गया। अपने पिता के उपदेश का उलटा असर देखकर उन देवियों के मन में और भी अधिक खेद हुआ और वे पुनः अपने पिता की शरण में गई। दक्ष प्रजापति अपनी सरल हृदया पुत्रियों का यह दुःख देख अत्यन्त व्यथित हुए और फिर चन्द्रमा को समझाने चले। चन्द्रमा के समीप जाकर उन्होंने बहुत समझाया और इस भेददृष्टि के अनेक दोष भी बताये । आपने यहाँ तक कहा कि जो समान श्रेणीवालों में विषमता का व्यवहार करता है,वह नरकगामी होता है । अतः विषमता रखना अनर्थकारी है; परन्तु चन्द्रमा की वह आसक्ति दूर न हुई। अन्त में दक्ष प्रजापति को अपने वचनों की अवहेलना देखकर क्रोध आ गया और उन्होंने चन्द्रमा को शाप दे दी कि जा तू क्षयी हों जा। शाप के देते ही चन्द्रमा का क्षय होना प्रारम्भ हो गया। 

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