चौरासी वैष्णव की वार्ता

vallabhacharya and srinathji

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आप जो अच्छा काम कर रहे हैं, उसे देखकर बहुत खुशी हुई 🙏🙏 -उत्सव दास

आपकी वेबसाइट ज्ञान और जानकारी का भंडार है।📒📒 -अभिनव जोशी

वेदधारा के माध्यम से मिले सकारात्मकता और विकास के लिए आभारी हूँ। -Varsha Choudhry

वेदधारा सनातन संस्कृति और सभ्यता की पहचान है जिससे अपनी संस्कृति समझने में मदद मिल रही है सनातन धर्म आगे बढ़ रहा है आपका बहुत बहुत धन्यवाद 🙏 -राकेश नारायण

यह वेबसाइट अद्वितीय और शिक्षण में सहायक है। -रिया मिश्रा

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क्या हनुमान जी और बालाजी एक ही हैं?

हनुमान जी बालाजी के नाम से भी प्रसिद्ध हैं। इसके अलावा तिरुपति वेंकटेश्वर स्वामी भी बालाजी नाम से जाने जाते हैं।

कठोपनिषद में यम प्रेय और श्रेय के बीच अंतर के बारे में क्या सिखाते हैं?

कठोपनिषद में, यम प्रेय (प्रिय, सुखद) और श्रेय (श्रेष्ठ, लाभकारी) के बीच के अंतर को समझाते हैं। श्रेय को चुनना कल्याण और परम लक्ष्य की ओर ले जाता है। इसके विपरीत, प्रेय को चुनना अस्थायी सुखों और लक्ष्य से दूर हो जाने का कारण बनता है। समझदार व्यक्ति प्रेय के बजाय श्रेय को चुनते हैं। यह विकल्प ज्ञान और बुद्धि की खोज से जुड़ा है, जो कठिन और शाश्वत है। दूसरी ओर, प्रेय का पीछा करना अज्ञान और भ्रांति की ओर ले जाता है, जो आसान लेकिन अस्थायी है। यम स्थायी भलाई को तत्काल संतोष के ऊपर रखने पर जोर देते हैं।

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पाकिस्तान के पंजाग क्षेत्र में स्थित मुल्तान किस मंदिर के लिये प्रसिद्ध था ?

दामोदरदास हरसानीकी वार्ता

एक समय श्रीआचार्यजी महाप्रभू पृथ्वी परिक्रमाकौं पधारे हुते तब तहां दामोदरदास श्रीआचार्यजी महाप्रभून के साथ है सो श्रीआचार्यजी महाप्रभू आप दामोदरदासों अपने श्रीमुखसों द्रमला कहते जो यह मार्ग तेरेलिये प्रगट कोनों है सो श्रीआचार्यजी महाप्रभू सो पृथ्वी परिक्रमा करते श्री गोकुल पधारे सो श्री गोकुलमें एक चांतरा श्रीगोविंदघाट ऊपर हुतो तहां श्रीआचार्यजी महाप्रभू आय विश्राम करते ताठोर ऊपर श्रीआचार्यजी महाप्रभूनकी बैठक है और श्रीद्वारकानाथजीको मन्दिर है तहां श्रीआचार्यजी महाप्रभू बैठे हुते ता समय श्रीआचार्यजी महाप्रभूनको महाचिंता उपजी जो श्रीठाकुरजीने तो आज्ञा दीनी है जो तुम जीवनकों ब्रह्मसंबन्ध करावो तब श्रीआचार्यजी। महाप्रभू अपने मन में विचारें जो जीवतो दोषवंत है और श्रीपुरुषोत्तमजीतो गुणनिधान हैं तातें केसे संबन्ध होय तातें चिन्ता उपजी सो अत्यंत आतुर भए तासमय श्रीठाकुरजी आप तत्काल प्रगट होयकें श्रीआचार्यजी महाप्रभूनसों पूंछे जो तुम चिंता आतुर क्यों हों तब श्रीआचार्यजी महाप्रभू आप कहै जो जीवको स्वरूपतौ तुम जानतही हो दोषवंत है सो तुमसों संबन्ध केसे होय तब श्रीठाकुररजी आप कहैं जो तुम जीवनकों ब्रह्मसंबन्ध करावोगे तिनको हौं अंगीकार करूंगो तुम जीवनकौं नाम देउगे तिनके सकल दोष निवर्त होयगे ये बातें श्रावणशुदि ११ के दिन अर्द्धरात्रिकौं भई प्रातकाल पवित्राद्वादशी हुती ताते पवित्रा सूतको करिराख्यो हुतो सो पवित्रा श्रीपूररुषोत्तमजीकौं पहरायौ मिश्री भोग धरी ता समयके ये अक्षरहुते ताकों श्रीआचार्यजी महाप्रभू आप सिद्धांतरहस्य ग्रंथ कीये हैं। सो श्लोक ॥ श्रावणस्यामले पक्षे एकादश्यां महानिशि।

साक्षाद्भगवताप्रोक्तमेतदक्षरमुच्यते ॥ १॥ 

ता समय श्रीआचार्यजी महाप्रभुनने पूछो जो दमलाते कुछ सुन्या तब दामोदरदासने बीनती कीनी जो महाराज श्रीठाकुरजीके वचन सुनतौसही परन्तु कुछ समझो नहीं तब श्रीआचार्यजी महाप्रभूननें कही जो मोको श्रीठाकुरजीने आज्ञा कीनी है जो तुम जीवनकौं ब्रह्मसंबंध करावोगे तिनकौं हों अंगिकार करूंगो तिनके सकल दोष निवृत्त होयगे ताते ब्रह्मसंबंध अवश्य करनो ॥ प्रसंग ॥१॥

बहुर श्रीआचार्यजी महाप्रभूनने श्रीठाकरजीके पास यह माग्यो जो मेरे आगे दामोदरदासकी देह न छूटे और श्रीआचार्यजी महाप्रभूनने दामोदरदास मों कछू गोप्य न राखते

और श्रीआचार्यजी महाप्रभू श्रीभागवत अहर्निस देखते कथा कहते और मार्गको सिद्धांत भगवतलीला रहस्य श्रीआचार्यजीमहाप्रभू आप दामोदरदासके हृदयमें स्थापन कीयो । ॥ प्रसंग ॥ २॥

और एकसमय दामोदरदास और श्रीगुसाईजी एकान्वमें बैठे हुते तब श्रीगुसाईजीने दामोदरदाससौ पूंछौ जो तुम श्रीआचार्यजी महाप्रभूनको कहाकार जानतही तब दामोदरदासने कही जो हम तौ श्रीआचार्यजी महापभूनको जगदीश जो श्रीठाकुरजी तिनहूंते अधिककारि जानत हैं तब श्रीगुसांईजी दामोदरदाससोकहैं जो तुम ऐसे क्यों कहत हो जो

श्रीठाकुरजीते श्रीआचार्यजी बडे हैं तब दामोदरदासनें कही जो महाराज दान बडोके दाता बडौ काहूके पास धन बहुत

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