अक्षय वट

भारत के पुण्य तीर्थों में पुराणों के अनुसार अक्षय वट नाम से दो स्थान पसिद्ध हैं: प्रयागराज और गया।

इन दोनों स्थानों ऐसे वट वृक्ष है जो प्रलय में भी नष्ट नहीं होता।

प्रलय काल में भगवान श्रीकृष्ण बालकृष्ण के रूप में इसके पत्ते के ऊपर ही जल में विराजते हैं।

अक्षय वट के दर्शन से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।

अक्षय वट - प्रयागराज

प्रयागराज के तीर्थ स्थानों मेंं मुख्य है अक्षय वट।

यह त्रिवेणी संगम के पास यमुना किनारे एक किले के अन्दर है।

अक्षय वट की महानता यह है कि प्रलय काल में भी यह नष्ट नहीं होता।

किले में एक गुफा है जिसका नाम है पातालपुरी।

पहले इस गुफा की एक सूखी डाल को ही अक्षय वट मानते थे।

यमुना किनारेवाले वट वृक्ष का बाद में पता चला।

श्रीराम जी, लक्ष्मण जी और सीता माता अपने वनवास के समय इसकी छाया में आराम किया था।

मार्कण्डेय महर्षि को श्रीमन्नारायण का दर्शन यहीं पर मिला था।

 

प्रयागराज में अक्षय वट का स्थान

 

अक्षय वट - गया

यहां के अक्षय वट को भगवान गदाधर का ही एक व्यक्त रूप माना गया है।

तथाऽक्षयवटं गत्वा विप्रान्संतोषयिष्यति।
ब्रह्माप्रकल्पितान्विप्रान्हव्यकव्यादिनार्चयेत्।

तैस्तुष्टैस्तोषिताः सर्वाः पितृभिः सह देवताः॥

  • वायु पुराण १०५.४५

अक्षय वट की छाया में उत्तम भोज्य पदार्थों द्वारा विप्रों को तृप्त करने से समस्त पितरगण और देवगण तुष्ट हो जाते हैं।

 

कृते श्राद्धेऽक्षयवटे अन्नेनैव प्रयत्नतः।

पितॄन्नयेद्ब्रह्मलोकमक्षयं तु सनातनम्॥

वटवृक्षसमीपे तु शाकेनाप्युदकेन च।

एकस्मिन्भोजिते विप्रे कोटिर्भवन्ति भोजिताः॥

  • वायु पुराण १११. ८० - ८१

अक्षय वट के पास एक विप्र को भी अन्न, शाक, और जल इत्यादियों से श्राद्ध की विधि से भोजन कराया तो एक करोड लोगों को भोजन कराने के समान पुण्य मिलता है।

 

 

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