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मुद्गल महर्षि   बडे तपस्वी थे । एक बार वे घोर तपस्या मे लग गये । बिना भोजन की तपस्या । सिर्फ द्वादशी के दिन , पन्द्रह दिन में एक बार एक द्रोण परिमित अन्न खाया करते थे । बाकी के दिनों मे कुछ नहीं । यह तपस्या सालों तक चली । देवता लोग बेचैन हो गये । ये चाहते क्या होंगे ? इन्द्र का पद ? ब्रह्म पद ? रुद्र पद ? इतनी घोर तपस्या क्यों कर रहे हैं ?

उन्होंने मुद्गल मुनी की परीक्षा लेने दुर्वासा महर्षि को उनके पास भेजा । आशु कोपी हैं दुर्वासा । सब डरते हैं उनसे । इन्द्र को भी शाप दिया है उन्होंने ।

दुर्वासा पहुंचे मुद्गल मुनि के पास ठीक द्वादशी के दिन।

एक पागल भिखारी का रूप धारण करके –

और बोले – मुझे खाना दो, भूख लगी है ।

मुद्गल्जी अपना द्रोण मात्र भोजन शुरू करने ही वाले थे ।

उन्होंने वह पूरा भोजन भिखारी को दे दिया ।

भिखारी ने वह पूरा खाया । बाद मे थोडा सा जूठा द्रोण मे बचा था उसे भी लेकर अपने शरीर मे लेप करके वहां से निकल गया ।

मुद्गल मुनी ने सोचा – मेरी तपस्या सफल हो रही है – देखो कितना बडा कार्य किया मैं ने – एक आदमी की भूख को मिटा पाया ।

वह तृप्त होकर चला गया – इससे बडा पुण्य क्या हो सकत है ?

अगले द्वादशी मे भिखारी वापस आया – ठीक उसी वक्त जब मुद्गलजी भोजन के लिये तैयार हो रहे थे ।

खाना उसे दिया गया और वह खाकर पहले जैसे चला गया ।

छः बार ऐसा ही हुआ ।

दुर्वासा महर्षि जानना चाहते थे कि मुद्गल्जी कब अपना संयम खो बैठेंगे और गुस्सा करेंगे ।

अगर ऐसा करते तो तपस्या का सारा पुण्य नष्ट हो जाता और ऊपर से दुर्वासाजी से शाप भी मिलता ।

लेकिन ऐसा नही हुआ ।

हर बार मुद्गल्जी ने खुशी खुशी ही उन्हें खिलाया ।

छठवें बार दुर्वासाजी ने अपना सही रूप दिखाया और बोला कि – अब तुम्हारा भोजन यहां नही स्वर्ग लोक में होगा ।

और मुद्गलजी को स्वर्ग लोक ले जाने देवदूत आये विमान लेकर और देवदूत ने कहा , आइये रथ पर बैठिये , स्वर्ग मे इन्द्रदेव देवगुरु बृहस्पति सब आपके इन्तज़ार कर रहे हैं ।

मुद्गलजी ने देवदूत से पूछा – यहां और स्वर्ग लोक मे फरक क्या है – क्या है स्वर्ग लोक में ? वहां अच्छा क्या है बुरा क्या है मुझे बताइये ।

देवदूत ने कहा – यह कर्म भूमि है और स्वर्ग भोग भूमि है ।

यहां जो भी अच्छा कर्म किया जाता है उसका फलस्वरूप सुख स्वर्ग मे भोगने को मिलता है ।

स्वर्ग लोक मे जाते ही जवानी वापस मिल जाती है और जब तक स्वर्गलोक मे है उम्र नही बढती ।

वहां गर्मी नहीं है, शैत्य नही है, थकावट नही होती स्वर्ग मे, पसीना नही छूटती ।

अप्सराओं के साथ सुखभोग है॥

स्वर्ग के सुख वर्णन के अतीत हैं ।

भूमि मे किया हुआ पुण्य के अनुसार सुख मिलता है स्वर्ग में ।

ठीक है, अब यह बताइये कि स्वर्ग मे दोष क्या है ।

देवदूत ने कहा – स्वर्ग में मुख्य रूप से तीन दोष हैं ।

पहला – आपको पता है कि भूमि मे जो भी आपने पुण्य कार्य किया उसके कारण उसका फल स्वरूप सुख का भोगने आप स्वर्ग जा रहे हैं -  लेकिन स्वर्ग मे जो कर्म किया जाता है उसका कोई फल नहीं है ।

अर्थात् – स्वर्ग जाने के बाद वहां रहकर आप कोई पुण्य नही कमा पायेंगे ।

जो यहां से पूण्य कमाकर लेकर जायेंगे उसकी समाप्ति होने तक ही आप स्वर्ग लोक में रह पायेंगे – यह उद्वेग स्वर्ग मे रहते वक्त हमेशा मन में रहेगा – कि मेरे पुण्य कभी न कभी खत्म हो जायेगा – और मुझे यहां से निकलना पडेगा ।

दूसरा – जब तक आप वहां रहेंगे – सब आप के साथ अच्छा व्यवहार करेंगे – बहुत से मित्र मिलेंगे आपको वहां और देवताओं के साथ उठना बैठना होगा – लेकिन आपका समय हो जाने पर ये मित्र आपका चेहरा तक नही देखेंगे – यही मित्र लोग आपको उठाकर नीचे फेंक देंगे ।

यह भय भी हमेशा मन मे रहेगा ।

तीसरा – बडे बडे पुण्यात्मा आते हैं स्वर्ग में और उनको बडा बडा सुख भोगने को मिलता है – आप से भी कई गुना अधिक ।

उन्हें देखकर आपको अपने आप पर अपकर्षता बोध आने लगेगा – अगर मैं न अधिक अच्छा कर्म किया होता तो इनके जैसा और अधिक सुख मिलता – यह भी आपको स्वर्ग लोक मे तडपायेगा – अन्दर से ।

तो स्वर्ग मे भी दोनों है – अनगिनत इन्द्रिय सुख – लेकिन अन्दर से ताप भी ।

और स्वर्गवास भी नित्य नहीं है – कुछ देर के लिये है ।

इसलिये कहते हैं मोक्ष ही अभिकाम्य है ।

मोक्ष प्राप्ति के लिये ही प्रयास करना चाहिये ।

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