Vedadhara
हनुमानजी वानर रूपी क्यों हैं ? सुनने के लिए क्लिक करें

यह बात सबको पता होगा कि हनुमानजी श्री रुद्र के ही अवतार हैं ।

श्रीरुद्र के ग्यारह स्वरूपों मे से ग्यारह्वां स्वरूप है हनुमानजी का ।

इससे पहले यह अवतार नन्दिकेश्वर के रूप में प्रकट हो चुका था ।

एक मुनि थे शिलाद ।

बडे तपस्वी थे शिलाद ।

यह स्वायम्भुव मन्वन्तर की बात है ।

भोलेनाथ के परम भक्त थे शिलाद ।

उनकी पत्नी पुत्र प्राप्ति की आशा प्रकट की ।

मुनि ने सोचा – एक साधारण पुत्र होने से कोई लाभ नहीं है  - वह दूसरे पशु पक्षियों जैसे कुछ साल जीयेगा और मरेगा ।

पुत्र हो तो ऐसा होना चाहिये जो कुल का नाम रोशन करेगा ।

ऐसे  पुत्र को पाना महादेव की कृपा के बिना सम्भव नही होगा ।

शिलाद विशेष तपस्या करने निकले ।

घोर तपस्या के अन्त में भगवान शंकर प्रसन्न होकर उनके सामने आये ।

भगवान ने कहा – जो वर चाहिये मांगो ।

शिलाद बोले – मुझे आप जैसे गुण और शक्ति से युक्त पुत्र का वरदान करें ।

शंभु बोले – मेरे जैसा क्यों – मैं ही तुम्हारा पुत्र बन जाता हूं ।

और शिलाद की पत्नी के गर्भ में अंशावतार के रूप में भगवान ने जन्म लिया ।

ग्यारहवां रुद्र के रूप में ।

सबको नन्दित मोदित करते हुए नन्दी बनकर ।

सात साल के उम्र में ही  नन्दी सारे वेद और शास्त्रों में अग्रणी बन गये ।

एक बार शिलाद के आश्रम में मित्र और वरुण पधारे ।

नन्दी को देखते ही उन्होंने बोला – आपका बेटा बडा विद्वान है – लेकिन यह अल्पायु है – इसकी आयु में एक साल ही अब बाकी है ।

इस बात को सुनकर शिलाद तीव्र दुख से मूर्छित हो गये॥

अपने पिताजी का  आश्वासन करके नन्दी ने कहा – आप चिन्ता मत कीजिये – मैं तपस्या करके महादेव को प्रसन्न करूंग और मृत्यु को जीत लूंगा ।

ठीक वैसा ही हुआ – नन्दी ने तपस्या की , महादेव प्रसन्न हुए, और नन्दी को अपना अनुचर बनाकर, अपने गण का स्वामी बनाकर अपने साथ कैलास में ही रहने का आदेश दिया ।

लेकिन नन्दी हमेशा अपना रूप बदलकर ही रह्ते थे । कभी बैल बनकर, कभी वानर बनकर ।

नन्दी सोचते थे – मैं महादेव का सेवक हूं । मेरी उनसे समता कभी नहीं होनी चाहिये – इसलिये नन्दी दूसरे रूप धारण करके घूमते थे ।

एक बार कैलास के शिखर पर नन्दी ध्यान में मग्न थे ।

रावण उस समय अपने पुष्पक विमान पर चढकर आया वहां ।

कैलास के पास पहुंचते ही विमान अपने आप रुक गया ।

रावण ने देखा तो एक वानर बैठा है ध्यान करते हुए ।

रावण ज़ोर ज़ोर से हसने लगा ।

नन्दी बोले – यह महादेव की क्रीडास्थली है । इसके पास विमान पर चढकर आना ही बडा अपराध है । ऊपर से तुम मेरा मज़ाक भी उडा रहे हो ।

मैं तुम्हें सबक सिखाता हूं ।

मैं इसी वानर के रूप मे आकर तुम्हें मेरी शक्ति दिखाऊंगा । तुम्हारे वंश को खत्म कर दूंगा ।

जब श्री हरी धर्ती पर श्रीरामजी के रूप मे अवतार लेने तैयार हो रहे थे तो भोलेनाथ ने नन्दी को भी उनकी सहायता करने का आदेश दिया ।

और नन्दी अञ्जना पुत्र बनकर जन्म लिये ।

इस मे भी उन्होंने अपने स्वामी श्री राघवेन्द्र की समता नही रखना चाहा और अपने आपको वानर का ही रूप दिये ।

और जिस भक्ति भाव से श्रद्धा से नन्दी के रूप महदेव की सेवा करते थे उतनी ही भक्ति और श्रद्धा से श्रीरामचन्द्र की भी सेवा किये ।

Hindi Topics ( Click on any topic to listen to audio )

General Topics

Children's Section ( Click on any topic to listen to audio )

Devotional Music ( Click on any topic to listen to audio )

Meditative Prayers ( Click on any topic to listen to audio )

Carnatic Music ( Click to listen to audio )

Copyright © 2019 | Vedadhara | All Rights Reserved. | Designed & Developed by Claps and Whistles
Vedahdara - Personalize