समुद्र मन्थन के कुछ सूक्ष्म तत्त्व

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सर्पों के जन्म के बारे में हमने देखा।
अरुण और गरुड के जन्म के बारे में हमने देखा।
इसके बाद महाभारत में आख्यान है समुद्र मन्थन का।
समुद्र मन्थन हमारे इतिहास की एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण घटना थी।
देवों और असुरों के बीच लडाइयां होती रही।
दोनों पक्ष का विजय और पराजय होता रहा।
पर देवों ने अमरत्व पाया अमृत द्वारा जो समुद्र मन्थन से निकला।
इस प्रकार जगत मे स्थायी रूप से धर्म की स्थापना हुई।
असुर जगत के संतुलन को बिगाडना चाहते हैं।
यह उनका स्वभाव है।
देव अगर असुर से बलवान रहेंगे तभी असुरों के षडयंत्रों को विफल कर पाएंगे।
अमृत के सेवन द्वारा ही यह हो पाया।
समुद्र मन्थन के बारे में आपने सुना ही होगा।
महाभारत में इसके कुछ सूक्ष्म तत्त्वों का विवरण है।
देव अमरत्व को पाना चाहते थे।
कौन हैं देव?
आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य और दो विश्वेदेव, या दो अश्विनी कुमार।
कुल मिलाकर तैंतीस।
इनमें से वसु पृथ्वी के देवता हैं।
रुद्र अंतरिक्ष के।
आदित्य आकाश के।
देवता लोग मेरु पर्वत के शिखर पर बैठकर विचार कर रहे थे।
कैसे हम अमर बन जाएं?
मृत्यु कभी नही होगी इस अवस्था को कैसे पाया जाएं?
ब्रह्मा जी और श्री हरि भी थे वहां।
श्री हरि ने कहा अमर बनने के लिए अमृत का सेवन करना पडेगा, अमृत पीना पडेगा।
समुद्र का मन्थन करने से अमृत की प्राप्ति होगी।
कैसा समुद्र?
क्षीर सागर?
महाभारत में क्षीर सागर का उल्लेख नहीं है।
कलशोदधिः - साधारण समुद्र।
उसमें खूब सारा ओषधियों का, वनस्पतियों का, जडी बूटियों रस निकलकर मिल गया तो वह दूध जैसे सफेद दिखने लगा।
मन्दर पर्वत पर - मन्दर पर्वत को ही मथनी बनाया गया था - मन्दर पर्वत पर जितने बडे बडे वृक्ष, जडी बूटियां, लाखों मेम करोडों मे, जब मन्थन चल रहा था तो ये सब गिरकर कुचलकर उनमें से जो रस निकला वह बहकर समुद्र में मिल गया।
समुद्र का जल औषधीय बन गया।
और उसका सार मन्थन द्वारा मक्खन जैसे निकाला गया, यह है अमृत।
अमृत अमरत्व इसलिए दे पाता है कि अमृत जितनी औषधीय जडी बूटियां हैं, ओषधियां हैं, वनस्पतियां हैं, उसका सार है।
सोचिए विशाल समुद्र में करोडों जडी बूटियों को डालकर मन्थन करके उसका एक कुम्भ भर जो सार निकलेगा वह कितना ताकतवर होगा।
यहां पर एक और व्यंजना है।
क्षीर सागर इसलिए कहते हैं कि दूध में भी ओषधि वनस्प्तियों का ही सार है।
मन्दर पर्वत पर बहुत सारे धातु, मणि इत्यादि भी थे।
उनमें भी औषधीय गुण है।
ये भी उस जल में मिल गये।
श्री हरि ने यही मार्ग दर्शन दिया था।
सर्वौषधीः समावाप्य सर्वरत्नानि चैव ह।
मन्दध्वमुदधिं देवा वेत्स्यध्वममृतं ततः॥
भगवान ने यही कहा -
तॆषाममृतवीर्याणां रसानां पयसैव च।
अमरत्वं सुरा जग्मुः काञ्चनस्य च निःस्रवात्॥
उनके रस से हि अमृत में अमरत्व देने का गुण आएगा।
मन्दर पर्वत कि ऊंचाई थी ११००० हजार योजना।
एक योजना लगभग ८ मील।
इस हिसाब से सोचिए कितना बडा होगा?
यह ऊंचाई भूतल के ऊपर।
नीचे भी उतनी ही।
देव इसे उठा नही पा रहे थे।
आदिशेष आये और उन्होंने अकेले ही उसे उखाडकर समुद्र में रख दिया।
महाभारत कहता है कि श्री हरि ने कूर्मावतार लेकर शुरू से ही इसे अपने पीठ पर धारण कर रखा था।
ऊपर से इन्द्रदेव ने वज्रायुध से उसे पकडकर रखा।
नागराज वासुकि मथनी की डोरी बन गये।
जब समुद्र को पता चला कि क्या होनेवाला है उन्होंने भी अमृत का हिस्सा मांगा।
देव वासुकि की पूंछ पकडे।
असुर सिर की ओर।
वासुकि दोनों तरफ से खींचते गये तो उनके मुंह से विष की लपटें और धुआ निकलने लगे।
आदिशेष बार बार वासुकि के सिर को ऊपर उठाकर झटकते थे।
वह जहरीली धुआ आकाश में घटा बनकर बरसने लगा बिजली के साथ।
करोडों मे जल जन्तु मरे।
कोई शांत वातावरण नहीं था।
सोचिए जहरीली धुआ, लपटें, घोर बारिश, बिजली, करोडों मे पेड पौधे कुचल रहे हैं, करोडों में प्राणी मर रहे हैं; संग्राम जैसे वातावरण था।
विष के ज्वालाओं के कारण असुर मूर्छित हो रहे हैं।
इसीलिए उनको सिर पकडने कहा गया था।
बहुत समय बीतने पर भी अमृत नहीं निकल रहा था।
देव और असुर सब थक गये।
तब ब्रह्मा जी ने श्री हरि से कहाः उनको बल दीजिए।
भगवान ने अनुग्रह किया।
कुछ समय बाद पहले चन्द्रमा निकल आया, उसके बाद लक्ष्मी देवी, उसके बाद सुरा देवी, मदिरा, उसके बाद कौस्तुभ मणि, उसके बाद पारिजात, उसके बाद गोमाता, उसके वाद उच्चैश्रवस नामक दिव्य अश्व।
सब आकाश में उडकर दिव्य लोक चले गये।
लक्ष्मी और कौस्तुभ को भगवान ने धारण कर लिया।
अंत मे धन्वन्तरि भगवान प्रकट हुए हाथ अमृत कुंभ को लिए।
देव और असुर अमृत के लिए लडने लगे।
यहां कद्रू और विनता की कहानी में उच्चैश्रवस की भूमिका है।

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