शक्ति का अर्थ क्या है? - वेदधारा

शक्ति ही इस संपूर्ण विश्व का सृजन पालन और संहार करती है; ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र के रूपों में, इनके माध्यम से।
देवता भी हमारे जैसे सुख और दुख का अनुभव करते हैं; इसके पीछे भी शक्ति की ही प्रेरणा है।

नदी अगर प्रवाह करती है तो इसका कारण शक्ति है।
अग्नि में अगर गर्मी है तो इसका कारण शक्ति है।
पानी अगर शीतल है तो इसका कारण शक्ति है।
सूरज और चंद्रमा में अगर प्रकाश है तो इसका कारण शक्ति है।

ईश्वर में समस्त कार्य करने का जो सामर्थ्य है इसी को शक्ति कहते हैं।
शक्ति के अभाव में ईश्वर निष्क्रिय हो जाते हैं।
इस शक्ति के माध्यम से ही ईश्वर की प्राप्ति भी हो सकती है।
ईश्वर जब जगत जी रचना करना चाहते हैं तो वे अपने एक अंश को शक्ति और शक्तिमान इस प्रकार विभाग कर देते है।

यह शक्ति पहले निर्गुणा है।
इस निर्गुणा शक्ति से सगुणा शक्ति उत्पन्न होती है।
यह सगुणा शक्ति ही ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र को जन्म देती है और उनके द्वारा जगत का सृजन, पालन और संहार करती है।
जगत की हर वस्तु, हर प्राणी, हर प्रकार की ऊर्जा, हर कार्य, हर चिंतन, हर आवेग इस शक्ति के ही सत्त्वरजस्तमो गुणों का क्रमचय और संचय हैं ।

शक्ति के कारण ही ब्रह्मा सोचते हैं कि, मैं ब्रह्मा हूं।
शक्ति के कारण ही विष्णु सोचते हैं कि, मैं विष्णु हूं।
शक्ति के कारण ही रुद्र सोचते हैं कि, मैं रुद्र हूं।

शक्ति का कोई एक स्वरूप नहीं है।
शक्ति का स्वरूप जगत का ही स्वरूप है ।
शक्ति और शक्ति वाली वस्तु को कभी भी अलग अलग नहीं कर सकते ।
जलाने की शक्ति के बिना आग और आग के बिना जलाने की शक्ति कभी दिखाई नहीं पड़ती।
वस्तु और उसकी शक्ति अभिन्न हैं।

शाक्ति और ईश्वर अभिन्न हैं।
जगत का स्वरूप ही शक्ति का स्वरूप है।

Author

Ramaswamy Sastry and Vighnesh Ghanapaathi

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देवी भागवत

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