यद्धात्रा निजभालपट्टलिखितम्

यद्धात्रा निजभालपट्टलिखितं स्तोकं महद्वा धनं
तत् प्राप्नोति मरुस्थलेऽपि नितरां मेरौ ततो नाऽधिकम् |
तद्धीरो भव वित्तवत्सु कृपणां वृत्तिं वृथा मा कृथाः
कूपे पश्य पयोनिधावपि घटो गृह्णाति तुल्यं जलम् ||

 

ब्रह्मा ने हमारे माथे पर हमारे लिए जितना धन लिखा है, हमे उतना ही धन मिलेगा | किसी के भी चाहने पर न ये कम होगा और न ही बढेगा | चाहे आप रेगिस्तान में रहो या सुमेरु पर्वत पर, वह धन कम-ज्यादा नहीं होगा |
इस लिए धैर्य रखो और धनवान व्यक्तियों को देखते ही लोभित होकर उनके सामने दीन मत बनो | चाहे कुंआ हो या समंदर, एक घडे में जितनी पानी निकालने की क्षमता है, वह उतना ही निकाल पाएगा |

 

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aatyk
वेदधारा का प्रभाव परिवर्तनकारी रहा है। मेरे जीवन में सकारात्मकता के लिए दिल से धन्यवाद। 🙏🏻 -Anjana Vardhan

वेदधारा सनातन संस्कृति और सभ्यता की पहचान है जिससे अपनी संस्कृति समझने में मदद मिल रही है सनातन धर्म आगे बढ़ रहा है आपका बहुत बहुत धन्यवाद 🙏 -राकेश नारायण

वेदधारा की समाज के प्रति सेवा सराहनीय है 🌟🙏🙏 - दीपांश पाल

आपकी वेबसाइट से बहुत कुछ जानने को मिलता है।🕉️🕉️ -नंदिता चौधरी

आपके प्रवचन हमेशा सही दिशा दिखाते हैं। 👍 -स्नेहा राकेश

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