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इस प्रवचन से जानिए- १. भगवान कैसे अपने भक्तों के दोषों को ही उनके फायदे के लिए बदल देते हैं। २. भगवान को परं सत्य क्यों कहते हैं।

श्रीमद्भागवत के पहले श्लोक का दूसरा पद- तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गोऽमृषा धाम्ना स्वेन सदा निरस्तकुहकं सत्यं परं धीमहि। बहुत ही महत्तपूर्ण एक स्पष्टीकरण है इसमें भगवान के बारे में, भागवत के प्रारंभ में ....

श्रीमद्भागवत के पहले श्लोक का दूसरा पद-

तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गोऽमृषा धाम्ना स्वेन सदा निरस्तकुहकं सत्यं परं धीमहि।

बहुत ही महत्तपूर्ण एक स्पष्टीकरण है इसमें भगवान के बारे में, भागवत के प्रारंभ में ही।

लोग भगवान के बारे में बहुत कुछ बताते हैं।

भगवान ऐसा है वैसा है।

जो अच्छा है वही भगवान है।
जो बुरा है वह भगवान नहीं है।

जो सुन्दर है वह भगवान है।
जो कुरूप है वह भगवान नहीं है।

ये सारी अपनी अपनी कल्पनाएं हैं।
हर एक की कल्पनाएं हैं।

भगवान इन सब से बन्धे नही हैं।

ऐसी कल्पनाएं करके आगे ये कहेंगे- यह भगवान ने अच्छा नहीं किया।
कर्ण के साथ न्याय नहीं किया।

क्या है भगवान का सही स्वरूप?
क्या भगवान सचमुच ये सब करते रहते हैं?

हमें लगता है कि भगवान ये सब करते रहते हैं।
पानी मे चन्द्रमा के प्रतिबिंब को देखकर हम सोच बैठते हैं कि चन्द्रमा उस पानी के अन्दर है।
और उसे पकडने जाते हैं।

यह इसलिए कि हमारे ही ज्ञानेन्द्रिय हमें सही जानकारी नही देती हैं।
जानकारी को सिकोड देती हैं।
कुछ गलत नहीं करती हैं।
उनका काम यही है।

बहुत ही कम लोग इसे समझ पाते हैं।
आम आदमी इन इन्द्रियों के भरोसे ही रहते हैं।
जो देखा वही सही, जो सुना वही सही।
इस प्रकार।

भगवान की कोई सीमा नहीं है।
किसी विषय में- आकार हो, शक्ति हो, ज्ञान हो, सामर्थ्य हो, किसी भी विषय में।

सीमा हमारी इन्द्रियों में है।

जब भगवान वृंदावन मे थे, जब गोपिकाएं उन्हें सचमुच सामने देख रही थीं, उनके सुन्दर आकार को सामने देख रही थीं, वह उनका वास्तविक आकार नहीं था।
उनको ऐसे लग रहा था।

चीटी के सामने आदमी का पैर है।
चीटी को लगता है कि वह एक दीवार है।

पर भगवान ने क्या किया?

उनकी इस त्रुटि को, उनके इस दोष को ही उनके फायदे के लिए कर दिया।

उसी के माध्यम से उन्हें ज्ञान प्राप्त कराया।
ब्रह्म की अनुभूति को प्राप्त कराया।

भगवान कुछ भी कर सकते हैं।
गुण को दोष में बदल सकते हैं।
दोष को गुण में बदल सकते हैं।

यही तो भगवान करते थे अपने धाम में, मथुरा में, धाम्ना स्वेन।
लोगों की अविद्या को मिटाते थे- निरस्तकुहकं।

मिथ्या से ही मिथ्या का विनाश करते थे।
कांटे से ही कांटे को निकालते थे।

अगर आपको सिर्फ हिन्दी ही पता हो और मुझे आपको संस्कृत सिखाना हो तो हिन्दी के माध्यम से ही हो पाएगा न पहले पहले?
यही भगवान करते थे।

यत्र त्रिसर्गोऽमृषा- यह जो हम समझ्ते हैं कि जगत का सृजन हो जाने पर सत्त्व रज और तमोगुण जो प्रवृत्त हो जाते हैं, भगवान भी इससे बाधित हो जाते हैं;
यह मृषा है, गलत है।

हां, भगवान कभी कभी ऐसे भी दिखांएंगे कि मैं परवश हो गया हूं।
पर यह तो नाटक है उनका।

उच्चतम जगत की शक्ति के रूप में, परब्रह्म के रूप में, परमार्थ के रूप में भगवान में दो ही दोष होने की संभावना है।

एक- कोई परिमिति जो साफ है कि नहीं है।
दूसरा - वे अपने कर्तव्य को नहीं निभाते हैं।
वह भी नहीं है।

धाम्ना स्वेन सदा निरस्तकुहकं।
सदा- सर्वदा, जो उनके शरण में जाते हैं उनकी अविद्या को खत्म कर देते है, सदा।

भगवान में ये दोनों ही दोष नही हैं।

भगवान परं सत्य हैं।
सत्य क्या है?
जो देश और काल से बाधित नहीं होता।

रात ठंडी है- यह तो जगह पर आश्रित है।
हर जगह रात ठंडी नही होती।
इसलिए यह कथन सत्य नहीं हो सकता।

भारत अंग्रेजों के अधीन में है।
था, अब नहीं।
तो यह भी कथन सत्य नहीं है।

भगवान के बारे में जो कुछ भी है वह देश के अनुसार या काल के अनुसार नहीं बदलता।
इसलिए भगवान सत्य हैं।
परं सत्य हैं।

उनसे बढकर और कोई सत्य नहीं है।

धीमहि - उनके ऊपर हम ध्यान करते हैं।

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