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इस प्रवचन से जानिए धरती पर ही बने स्वर्ग लोक के बारे में।

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नैमिषारण्य कहां है ?
नैमिषारण्य लखनऊ से ८० किलोमीटर दूर सीतापुर जिले में है । अयोध्या से नैमिषारण्य की दूरी है २०० किलोमीटर ।

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वैष्णोदेवी की यात्रा कहां से शुरू होती है ?

हमने देखा कि तमोयुग, प्राणियुग, मणिजा युग, साध्य युग, संघर्ष युग और देवयुग इस प्रकार से मानवता और सभ्यता का विकास हुआ। इसमें साध्य जो देवों के पूर्वज थे, उनके बीच में अध्यात्म को लेकर कई मत आये। और इनको लेकर उनके बीच संघर्....

हमने देखा कि तमोयुग, प्राणियुग, मणिजा युग, साध्य युग, संघर्ष युग और देवयुग इस प्रकार से मानवता और सभ्यता का विकास हुआ।

इसमें साध्य जो देवों के पूर्वज थे, उनके बीच में अध्यात्म को लेकर कई मत आये।

और इनको लेकर उनके बीच संघर्ष चला जो कई हजारों सालों तक चला।

इसके बाद पृथ्वी पर ब्रह्मा जी का अवतार हुआ पुष्कर पुर में।

यह राजस्थान वाला पुष्कर नहीं है, यह उज्बेकिस्तान में है- बुखारा शहर।

और उन्होंने इन सारे मतों का निराकरण करके ब्रह्मवाद की स्थापना की जो एकेश्वर वाद था।

इसी कारण से ही उनका ब्रह्मा नाम भी पडा।

उन्होंने ही जगत की रक्षा की।

ब्रह्मा जी स्वयंभू थे, इनके कोई माता पिता नही थे।

एकेश्वर वाद को मूल मानकर ही उन्होंने प्रजातंत्र को हटाकर राजतंत्र की भी स्थापना की थी।

कई शासक नहीं, एक राजा।

ब्रह्मा ने चार प्रकार की सृष्टि की धरती पर ही- वेद सृष्टि, लोक सृष्टि प्रजा सृष्टि और धर्म सृष्टि।

सबसे पहले वेद प्रकट हुए।

वेदों को अपने माध्यम से ब्रह्मा जी ने प्रकट किया।

वेदों के आधार पर ही आगे की सृष्टि होनी है।

लोकों की सृष्टि - धरती पर ही त्रिलोक बनाये गये।

जो ब्रह्माण्ड की पृथ्वी - अंतरिक्ष - स्वर्ग इस दिव्य त्रिलोक की व्यवस्था पर आधारित था।

हमारे शरीर में भी यही व्यवस्था विद्यमान है।

उदर गुहा- पृथ्वी।

उरो गुहा- छाती की गुहा- अंतरिक्ष।

और कपाल गुहा- स्वर्ग।

इसी व्यवस्था के अनुसार ब्रह्मा जी ने भूमि पर देव त्रिलोक और असुर त्रिलोक बनाये।

जम्बूद्वीप यानि यूरेशिया देव त्रिलोक।

अफ्रीका ओर अमरीका असुर त्रिलोक।

प्रजा सृष्टि में- इन्द्र, वरुण, अग्नि इत्यादि देव; हैहय, कालकेय इत्यादि असुर वंश; मानव इन सबकी सृष्टि हुई।

इसके बाद वर्ण धर्म और आश्रम धर्म के द्वारा इन सबका जीवन और परस्पर व्यवहार को सुनिश्चित किया।

यह हुई धर्म सृष्टि।

भारत वर्ष इस धरती पर जो देव त्रिलोक है उस में पृथ्वी है, मनुष्य लोक है।

भारतवर्ष की उत्तर सीमा- हिमालय, दक्षिण सीमा- समुद्र, पूर्व सीमा- चीनसमुद्र, और पश्चिम सीमा- महीसागर- मेडिटेरेनियन।

वैवस्वत मनु भारत वर्ष के सम्राट बनाए गये।

मनु से ही मानव शब्द की व्युत्पत्ति है- मनु की प्रजा मानव जो मनुष्य लोक में वास करते हैं, भारत वर्ष में।

अंतरिक्ष लोक- मध्य एशिया, यहां यक्ष और गन्धर्व निवास करते थे, उस देव युग में।

स्वर्ग लोक- रूस, साइबीर्या - यहां भौम देवता निवास करते थे।

मनुष्य लोक का शासी देवता, संचालक देवता बनाये गये अग्नि।

अग्नि के इस स्वरूप का नाम था भरत।

वेद में कहा है- अग्ने महां असि ब्राह्मण भारतेति।

इस भरत से ही भारत वर्ष नाम पडा।

भरत का वर्ष भारत वर्ष।

और भी दो प्रसिद्ध भरत हुए बाद में।

भरत का देश भारत वर्ष।

अंतरिक्ष लोक में हिमालय से मंगोलिया तक यक्ष, किन्नर, पिशाच, गुह्यक, सिद्ध इन सबका निवास स्थान था।

यहां का शासी देवता वायु।

इससे भी ऊपर, उत्तर समुद्र तक रूस, सायबीरिया- यह प्रदेश भूमि पर देवलोक।

इन्द्र यहां के शासी देवता बनाए गये।

भौम देवताओं को जिम्मेदारियां दी गयी; इन्द्र को ज्योतिविभाग की, वरुण को पानी की, सोम को ओषधियों की, यम को वनस्पति और पितरों की।

यह ब्रह्मा जी की व्यवस्था थी।

असुर त्रिलोक में भी अफ्रीका और अमरीका में भी इसी प्रकार की व्यवस्था की गयी।

असुर त्रिलोक यूरोप के भी कुछ भाग में व्याप्त था।

मान लीजिए कि यूरोप के कुछ दक्षिण पश्चिमी भाग, और अफ्रिका के कुछ उत्तर पूर्वी भाग; ये देवासुर युद्ध के समय कभी यहां तो कभी वहां, इस प्रकार बदलता रहा है।

आगे भी देव युग की व्यवस्था के बारे में देखते जाएंगे।

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