गरुड़ का अर्थ

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शास्त्रों पर स्पष्ट और अधिकारिक शिक्षाओं के लिए गुरुजी को हार्दिक धन्यवाद -दिवाकर

अद्वितीय website -श्रेया प्रजापति

वेदधारा समाज के लिए एक महान सेवा है -शिवांग दत्ता

आपकी वेबसाइट बहुत ही मूल्यवान जानकारी देती है। -यशवंत पटेल

बहुत प्रेरणादायक 👏 -कन्हैया लाल कुमावत

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क्या हनुमान चालीसा का पाठ सबेरे नहीं कर सकते?

आमतौर पर लोगों और कई महात्माओं से सुनने में आता है कि 'सवा पहर दिन चढ़ने से पहले श्रीहनुमान जी का नाम-जप और हनुमान चालीसा का पाठ नहीं करना चाहिए।' क्या यह सच है? कुछ लोग कहते हैं कि हनुमान जी रात में जागते हैं, इसलिए सुबह 'सोते रहते हैं' या श्रीराम जी की सेवा में व्यस्त रहते हैं, इस कारण सवा पहर वर्जित है। लेकिन इसका कोई प्रमाण नहीं है। और यह भी सही नहीं लगता कि योगिराज, ज्ञानियों में अग्रणी श्रीहनुमान जी पहरभर दिन चढ़ने तक सोते रहते हैं, या उनका दिव्य शरीर और शक्ति इतनी सीमित है कि एक ही रूप से श्रीराम जी की सेवाओं में व्यस्त रहते हुए वे अन्य रूपों में अपने भक्तों की सेवा नहीं कर सकते। जहाँ प्रेमपूर्वक श्रीराम का नाम-जप और श्रीरामायण का पाठ होता है, वहाँ श्रीहनुमान जी हमेशा मौजूद रहते हैं,चाहे वह सुबह हो या कोई और समय। अगर इस तर्क को मानें तो हमें श्रीहनुमान जी के आराम के लिए सवा पहर तक भगवद्भजन छोड़ना पड़ेगा, जो कि उनके दृष्टिकोण से विपत्तिजनक है - कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई । जब तव सुमिरन भजन न होई ॥ इसलिए एक क्षण भी भक्तों को श्रीहनुमान जी के नाम-जप और पाठ से विमुख नहीं होना चाहिए। प्रातःकाल का समय भजन के लिए उत्कृष्ट है। श्रीहनुमान जी हमेशा और सभी समयों में वंदनीय हैं। सुंदरकांड का दोहा (प्रातः नाम जो लेई हमारा) हनुमान जी द्वारा बोला गया था जब हनुमान जी लंका जाते हैं और विभीषण से मिलते हैं, तब विभीषण कहते हैं कि वह एक राक्षस हैं। विभीषण अपने शरीर को तुच्छ और खुद को दुर्भाग्यपूर्ण मानते हैं। हनुमान जी को लगता है कि विभीषण ने अपने राक्षसी रूप के कारण हीनभावना विकसित कर ली है। विभीषण को सांत्वना देने के लिए हनुमान जी कहते हैं कि वे (हनुमान जी) भी महान नहीं हैं और अगर कोई सुबह उनका नाम लेता है (वे एक बंदर होने के नाते), तो उसे पूरे दिन भोजन नहीं मिलेगा। यह ध्यान रखना चाहिए कि हनुमान जी ने यह केवल विभीषण को सांत्वना देने के लिए कहा था। वास्तव में, इस बात में कोई सच्चाई नहीं है कि हनुमान जी को देखने से किसी को भोजन नहीं मिलेगा। हनुमान जी हमारे संकटों से रक्षक हैं।

श्री गंगाजी के दर्शन का फल

अग्निपुराण में कहा है जो गंगाजी का दर्शन, स्पर्श, जलपान या मात्र गंगा नाम का उच्चार करता है वह अपनी सैकडों हजारों पीढियों के लोगों को पवित्र कर देता है।

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पञ्चायन पूजा के बारे में किस उपनिषद में उल्लेख है ?

गरुड देवों से अमृत छीनने स्वर्ग लोक की ओर जा रहे थे । उनको बहुत भूख लगी । गरुड के पिताजी कश्यप प्रजापति ने उनसे कहा कि उस तालाब मे एक बडा हाथी और एक बडा कछुआ जो आपस मे लड रहे हैं उन्हें खा लो । उन्हें पंजों से झपटकर गरुड अलम्बत....

गरुड देवों से अमृत छीनने स्वर्ग लोक की ओर जा रहे थे ।
उनको बहुत भूख लगी ।
गरुड के पिताजी कश्यप प्रजापति ने उनसे कहा कि उस तालाब मे एक बडा हाथी और एक बडा कछुआ जो आपस मे लड रहे हैं उन्हें खा लो ।
उन्हें पंजों से झपटकर गरुड अलम्बतीर्थ की ओर चले गये और वहां एक वट वृक्ष की सौ योजन लम्बी शाखा मे बैठे तो वह शाखा टूट गयी ।
उसे अपनी चोंच से पकड लिया ।
क्यों?
गरुड ने देखा कि उस शाखा में से कुछ तापस लोग उल्टा लटक रहे थे?
वे तापसे थे वालखिल्य ।

गरुड के आकार को देखकर वालखिल्य स्वयं विस्मित हो गये ।
४८ मील ऊंचा हाथी ।
कछुए का व्यास ८० मील ।
इनको अपने पंजों में पकडकर एक पक्षी आया है ।
उन महर्षियों ने कहा -
गुरुं भारं समासाद्योड्डीन एष विहंगमः ।
गरुडस्तु खगश्रेष्ठस्तस्मात् पन्नगभोजनः ॥
गरुड का नामकरण गरुड इस प्रकार नामकरण इन्होंने ही किया था ।

गुरुं आदाय उड्डीन इति गरुडः
गुरु का अर्थ है महान ।
महान भार को लेकर यह पक्षी उडकर आया है । इसलिए इसका नाम होगा गरुड ।
जब गरुड पर्वतों के पास से उडते थे तो पर्वत कांपते थे ।
गरुड के पंखों से तूफान उठता था ।
उस वटवृक्ष की शाखा को जिससे वालखिल्य महर्षि जन लटक रहे थे उसे चोंच मे लेकर गरुड उडते रहे उडते रहे और गन्धमादन पर्वत पहुंच गये ।
वहां फिर से अपने पिताजी से मिलन हुआ ।
कश्यपजी तपस्या कर रहे थे ।
उन्होंने अपनी आंखें खोली ।
देखा क्या हो रहा था ।
बोला - बेटा सम्हालना । उग्र तापस हैं । कुछ गलत हुआ तो क्षण भर में तुम्हें भस्म कर देंगे ।
देखिए तप शक्ति का प्रभाव ।
गरुड को पहाडों को कंपाते थे उनको भी ये नन्हे से महर्षि जन भस्म कर सकते हैं।
कश्यपजी कहते हैं ये वालखिल्य सूर्य की किरणों को पीते हैं ।
उनको कोई हानी नहीं पहुंचनी चाहिए ।
कश्यपजी ने वालखिल्यों से विनती की - आप लोग कृपा करके गरुड को जाने देजिए । वह एक महान कार्य के लिए उद्यत है जिसमे सबकी भलाई है ।
वालखिल्य वृक्ष की शाखा से उतरे और हिमालय की ओर चले गये ।
गरुड ने कश्यपजी से पूछा - इस शाखा को मैं कहां रखूं?
कश्यपजी ने एक बर्फीला पर्वत शिखर दिखाया, गरुड ने वहां उसे रखकर हाथी और कछुए को खा लिया ।
इस बीच स्वर्ग लोक में आपत्ति की पूर्वसूचनाएं दिखाई देने लगी ।
उल्कापात होने लगा ।
हत्यार अपने आप एक दूसरे से लडने लगे ।
खुले आसमान से मेघों का गर्जन सुनाई देने लगे ।
देवों ने जिन हारों को पहन रखा था , उनके फूल मुरझाने लगे ।
खून की बारिश बरसने लगी ।
आंधी होने लगी और उसकी धूल ने देवों के मकुटों को निष्प्रभ कर दिया ।

देव अपने गुरु बृहस्पति के पास गये ।
गुरुजी यह सब क्या है ? इसका अर्थ क्या है ।
बृहस्पति ने इन्द्र से कहा - तुम्हारी गलती है ।
तुम्हारी घमंड की नतीजा है यह ।
कश्यप और विनता का पुत्र आ रहा है ।
अमृत ले जाने ।
उसके जन्म के पीछे वालखिल्य महर्षियों की तप शक्ति है ।
उसे रोक नहीं पाऒगे ।

इन्द्र ने उन देवों को जो अमृत की सुरक्षा में लगे थे उन्हें सावधान रहने कहा ।
अन्य देवता भी अपने आयुधों को लेकर अमृते कुम्भ की चारों ओर खडे हो गये ।
स्वर्ग लोक इन आयुधों की रोशनी से चमक उठा ।
इन्द्र देव भी स्वयं वज्रायुध को लेकर अमृत की रक्षा के लिए खडे हो गये ।
आगे देखेंगे गरुड और देवों के बीच हुई लडाई के बारे में ।

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