आयुष्य सूक्त

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वेदधारा समाज की बहुत बड़ी सेवा कर रही है 🌈 -वन्दना शर्मा

वेदधारा से जुड़ना एक आशीर्वाद रहा है। मेरा जीवन अधिक सकारात्मक और संतुष्ट है। -Sahana

वेदधारा का कार्य अत्यंत प्रशंसनीय है 🙏 -आकृति जैन

अच्छा मंत्र, इसकी ऊर्जा महसूस कर रहा हूँ! 😊 -जयप्रकाश कुमार

यह वेबसाइट अत्यंत शिक्षाप्रद है।📓 -नील कश्यप

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राजा दिलीप और नन्दिनी

राजा दिलीप के कोई संतान नहीं थी, इसलिए उन्होंने अपनी रानी सुदक्षिणा के साथ वशिष्ठ ऋषि की सलाह पर उनकी गाय नन्दिनी की सेवा की। वशिष्ठ ऋषि ने उन्हें बताया कि नन्दिनी की सेवा करने से उन्हें पुत्र प्राप्त हो सकता है। दिलीप ने पूरी निष्ठा और श्रद्धा के साथ नन्दिनी की सेवा की, और अंततः उनकी पत्नी ने रघु नामक पुत्र को जन्म दिया। यह कहानी भक्ति, सेवा, और धैर्य का प्रतीक मानी जाती है। राजा दिलीप की कहानी को रामायण और पुराणों में एक उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है कि कैसे सच्ची निष्ठा और सेवा से मनुष्य अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है।

भागवत के मार्ग में ज्ञान और वैराग्य कैसे विकसित होते हैं?

भागवत के मार्ग में साधक को केवल भगवान में रुचि के साथ उनकी महिमाओं का श्रवण यही करना है। भक्ति अपने आप विकसित होगी। भक्ति का विकास होने पर ज्ञान और वैराग्य अपने आप आ जाएंगे।

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अगस्त्य महर्षि का जन्म एक कुंभ से हुआ था । इसलिये उन्हें कुंभसंभव कहते हैं । उसी कुंभ से किसी और का भी जन्म हुआ था । कौन था वह ?

यो ब्रह्मा ब्रह्मण उज्जहार प्राणैः शिरः कृत्तिवासाः पिनाकी । ईशानो देवः स न आयुर्दधातु तस्मै जुहोमि हविषा घृतेन ॥ १ ॥ विभ्राजमानः सरिरस्य मध्या-द्रोचमानो घर्मरुचिर्य आगात् । स मृत्युपाशानपनुद्य घोरानिहायुषेणो घृतम....

यो ब्रह्मा ब्रह्मण उज्जहार प्राणैः शिरः कृत्तिवासाः पिनाकी ।
ईशानो देवः स न आयुर्दधातु तस्मै जुहोमि हविषा घृतेन ॥ १ ॥
विभ्राजमानः सरिरस्य मध्या-द्रोचमानो घर्मरुचिर्य आगात् ।
स मृत्युपाशानपनुद्य घोरानिहायुषेणो घृतमत्तु देवः ॥ २ ॥
ब्रह्मज्योति-र्ब्रह्म-पत्नीषु गर्भं यमादधात् पुरुरूपं जयन्तम् ।
सुवर्णरम्भग्रह-मर्कमर्च्यं तमायुषे वर्धयामो घृतेन ॥ ३ ॥
श्रियं लक्ष्मी-मौबला-मम्बिकां गां षष्ठीं च यामिन्द्रसेनेत्युदाहुः ।
तां विद्यां ब्रह्मयोनिग्ं सरूपामिहायुषे तर्पयामो घृतेन ॥ ४ ॥
दाक्षायण्यः सर्वयोन्यः स योन्यः सहस्रशो विश्वरूपा विरूपाः ।
ससूनवः सपतयः सयूथ्या आयुषेणो घृतमिदं जुषन्ताम् ॥ ५ ॥
दिव्या गणा बहुरूपाः पुराणा आयुश्छिदो नः प्रमथ्नन्तु वीरान् ।
तेभ्यो जुहोमि बहुधा घृतेन मा नः प्रजाग्ं रीरिषो मोत वीरान् ॥ ६ ॥
एकः पुरस्तात् य इदं बभूव यतो बभूव भुवनस्य गोपाः ।
यमप्येति भुवनग्ं साम्पराये स नो हविर्घृत-मिहायुषेत्तु देवः ॥ ७ ॥
वसून् रुद्रा-नादित्यान् मरुतोऽथ साध्यान् ऋभून् यक्षान् गन्धर्वाग्श्च
पितॄग्श्च विश्वान् ।
भृगून् सर्पाग्श्चाङ्गिरसोऽथ सर्वान् घृतग्ं हुत्वा स्वायुष्या महयाम
शश्वत् ॥ ८ ॥

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