आपके बच्चे की सुरक्षा के लिए मंत्र

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मंत्र बहुत उपयोगी है व्यावहारिक रूप से। 🙏 -आदर्श गुप्ता

वेदधारा सनातन संस्कृति और सभ्यता की पहचान है जिससे अपनी संस्कृति समझने में मदद मिल रही है सनातन धर्म आगे बढ़ रहा है आपका बहुत बहुत धन्यवाद 🙏 -राकेश नारायण

वेदधारा का प्रभाव परिवर्तनकारी रहा है। मेरे जीवन में सकारात्मकता के लिए दिल से धन्यवाद। 🙏🏻 -Anjana Vardhan

बहुत बड़ा सहारा है मेरे लिए यह 👍 -pratyasha

आपके मंत्रों से मुझे बहुत प्रेरणा मिलती है। 🙏 -ujjwal nikam

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शिवलिंग में योनि क्या है?

शिवलिंग का पीठ देवी भगवती उमा का प्रतीक है। प्रपंच की उत्पत्ति के कारण होने के अर्थ में इसे योनी भी कहते हैं।

शिव और शक्ति के बीच क्या संबंध है?

शिव और शक्ति एक ही सिक्के के दो पहलू जैसे हैं। जैसे चन्द्रमा के बिना चांदनी नहीं, चांदनी के बिना चन्द्रमा नहीं; शिव के बिना शक्ति नहीं और शक्ति के बिना शिव नहीं।

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लोपामुद्रा किसकी पुत्री थी ?

मा ते कुमारं रक्षो वधीन्मा धेनुरत्यासारिणी। प्रिया धनस्य भूया एधमाना स्वे गृहे। अयं कमारो जरां धयतु दीर्घमायुः । यस्मै त्वं स्तन प्रप्यायायुर्वर्चो यशो बलम्‌। यद्भूमेहृदयं दिवि चन्द्रमसि श्रितम्‌। तदुर्वि पश....

मा ते कुमारं रक्षो वधीन्मा धेनुरत्यासारिणी।
प्रिया धनस्य भूया एधमाना स्वे गृहे।
अयं कमारो जरां धयतु दीर्घमायुः ।
यस्मै त्वं स्तन प्रप्यायायुर्वर्चो यशो बलम्‌।
यद्भूमेहृदयं दिवि चन्द्रमसि श्रितम्‌।
तदुर्वि पश्यं माऽहं पौत्रमघं रुदम्‌।
यत्ते सुसीमे हृदयं वेदाऽहं तत्प्रजापतौ।
वेदाम तस्य ते वयं माऽहं पौत्रमघं रुदम्‌।
नामयति न रुदति यत्र वयं वदामसि यत्र चाभिमृशामसि।
आपस्सुप्तेषु जाग्रत रक्षांसि निरितो नुदध्वम्‌।
अयं कलिं पतयन्तं श्वानमिवोद्वृद्धम्।
अजां वाशिंतामिव मरुतः पर्याध्वं स्वाहा।
शण्डेरथश्शण्डिकेर उलूखलः।
च्यवनो नश्यतादितस्स्वाहा।
अयश्शण्डो मर्क उपवीरं उलूखलः।
च्यवनो नश्यतादितस्स्वाहा।
केशिनीश्श्वलोमिनीः खजापोऽजोपकाशिनीः।
अपेत नश्यतादितस्स्वाहा।
मिश्रवाससः कौबेरका रक्षोराजेन प्रेषिताः।
ग्रामं सजानयो गच्छन्तीच्छन्तोऽपरिदाकृतान्थ्स्वाहा।
एतान्‌ घ्नतैतान्गृह्णीतेत्ययं ब्रह्मणस्पुत्रः।
तानग्निः पर्यसरत्तानिन्द्रस्तान्बृहस्पतिः।
तानहं वेद ब्राह्मणः प्रमृशतः कूटदन्तान्‌ विकेशान्लम्बनस्तनान् स्वाहा।
नक्तञ्चारिण उरस्पेशाञ्छूलहस्तान्कपालपान्।
पूव एषां पितेत्युच्चैश्श्राव्यकर्णकः।
माता जघन्या सर्पति ग्रामे विधुरमिच्छन्ती स्वाहा।
निशीथचारिणी स्वसा सन्धिना प्रेक्षते कुलम्‌।
या स्वपन्तं बोधयति यस्यै विजातायां मनः।
तासां त्वं कष्णवर्त्मने क्लोमानं हृर्दयं यकृत्‌।
अग्ने अक्षीणि निर्दह स्वाहा।

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