अच्छे कर्म का परिणाम​

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दक्षिण-पूर्व दिशा कौन सी होती है?

किसी घर या भूखंड की पूर्व और दक्षिण दिशाएं जहां मिलती हैं उस स्थान को दक्षिण-पूर्व कहते हैं । वास्तु शास्त्र में दक्षिण-पूर्व दिशा को आग्नेय कोण भी कहते हैं।

शक्ति के पांच स्वरूप क्या क्या हैं?

१. सत्त्वगुणप्रधान ज्ञानशक्ति २. रजोगुणप्रधान क्रियाशक्ति ३. तमोगुणप्रधान मायाशक्ति ४. विभागों में विभक्त प्रकृतिशक्ति ५. अविभक्त शाम्भवीशक्ति (मूलप्रकृति)।

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राजस्थान के यह लोक देवाता गौतमेश्वर महादेव के नान से भी जाने जाते हैं । कौन है यह ?

अच्छे कर्म करने के क्या परिणाम मिलते हैं? युधिष्ठिर ने भीष्माचार्य से यह जानना चाहा। यह था भीष्माचर्य का उत्तर। आप अगले जन्मों में जो अपने कर्म के परिणाम प्राप्त करेंगे वह बात पर निर्भर करता है कि आपने इसे कैसे किया है।....

अच्छे कर्म करने के क्या परिणाम मिलते हैं?
युधिष्ठिर ने भीष्माचार्य से यह जानना चाहा।
यह था भीष्माचर्य का उत्तर।

आप अगले जन्मों में जो अपने कर्म के परिणाम प्राप्त करेंगे वह बात पर निर्भर करता है कि आपने इसे कैसे किया है।
यदि आपने अपने शरीर द्वारा किसी की मदद की है, तो आप अपने शरीर द्वारा ही सुख-भोग करेंगे।
यदि आपने अपनी वाणी से अच्छा कर्म किया है, जैसे आपने विष्णु सहस्रनाम का जप करके पुण्य प्राप्त किया है, तो आप अगले जन्म में अच्छे शब्द और प्रशंसा सुनेंगे।
अच्छे मानसिक कर्म के लिए, आपको उसके परिणामस्वरूप बाद के जन्मों में मानसिक सुख-शांति मिलेगी।

यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि आपने वह विशेष कर्म कब किया है।
यदि आपन्ने अच्छे कर्म अपनी जवानी के दौरान किया है, तो इसका परिणाम भी आगे जवानी में ही मिलेगा।
यदि यह बुढ़ापे के दौरान है, तो परिणाम बुढ़ापे के दौरान मिलेगा।

आपने कर्म कैसे और कब किया है दोनों ही महत्वपूर्ण हैं।
अच्छे कर्म करने में अपने शरीर और मन दोनों को समर्पित करना बहुत महत्वपूर्ण है।
उदाहरण के लिए, यदि कोई अतिथी आपके घर आता है।
उसे प्रेम भरी आँखों से स्वागत करें, उससे मधुरता से बात करें, उत्सुकता से उसकी सेवा करें, अपने आप को फोन कॉल या किसी और चीज से विचलित न होने दें, जब तक वह आपके साथ है, अपना पूरा समय उसके लिए विशेष रूप से बिताएं।
जब वह जाने निकले, तो उसके साथ कुछ दूरी तक जाएं।
यदि आप इस तरह के समर्पण के साथ किसी आतिथि की सेवा करेंगे, तो आपको यज्ञ करने का फल मिलेगा।
देखिए, हमारी संस्कृति में अतिथि सत्कार कितनी महत्वपूर्ण है।
अतिथिदेवो भव - अपने अतिथि के साथ ऐसा व्यवहार करें जैसे वह भगवान है, वहआपके लिए भगवान जैसा होना चाहिए।
आतिथ्य उद्योग में, ग्राहक राजा है, अतिथि राजा है।
हमारी संस्कृति में, अतिथि परमेश्वर है।

कोई जो आपके पास भूखा और प्यासा आता है, उसे अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए, भले ही वह अनजान हो।
जो लोग आरामदायक बिस्तर का त्याग करते हैं और जमीन पर सोते हैं, उन्हें अपने अगले जन्म में आरामदायक बिस्तर मिलेगा।
यही त्याग का सिद्धांत है।
यह भविष्य के लिए बचत करने जैसा है।
अभी छोडेंगे तो, बाद में पाएँगे।
जो आपके लिए नियत है कर्मवश उसे कभी न कभी आपके पास आना ही होगा।
अगर आप अभी त्याग करेंगे, तो वह बाद में आपके पास आ जाएगा।
यदि आप महंगे कपड़े छोड़ देते हैं और साधारण कपडे पहनते हैं, तो आपको भविष्य में कभी भी अच्छे कपड़ों की कमी नहीं होगी।

यदि आप द्वंद्व के भाव को छोड देते हैं - कि यह अच्छा है और यह बुरा है, वह नीच है और यह श्रेष्ठ है - यही योग का लक्ष्य है - तो आपको भविष्य के जन्मों में आरामदायक वाहन मिलेंगे।
यह परिणाम है लेकिन अद्वैत भाव को हासिल करने के बाद ये सब वास्तव में आपके लिए मायने रखता है या नहीं, यह एक अलग सवाल है।
यदि आप इस जन्म में अग्नि की पूजा करते हैं, तो आप बहुत साहस, शक्ति और वीरता के साथ पुनर्जन्म लेंगे।
यदि आप स्वादिष्ट भोजन के लिए तरसना छोड़ देते हैं, तो आपको अगले जन्म में सौभाग्य मिलेगा।
यदि आप मांसाहारी खाना छोड़ देते हैं, तो आपको धन और संतान मिलेगी।
योग और ब्रह्मचर्य का पालन करने से आप अगले जन्म में अपनी सभी इच्छाओं को प्राप्त करेंगे।

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